बिहार : निर्वाचित एकतंत्र की प्रयोगशाला; ज़रुरत है तीसरी आज़ादी की?

करीब डेढ़ सौ बरस पहले किसी क्रांतिकारी चिंतक ने कहा था कि राज्यसत्ता का चरित्र निरपेक्ष नहीं होता है, वर्ग सापेक्ष होता है. यह मत आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 19 वीं सदी में था।

मोदी+शाह सत्ता प्रतिष्ठान के कारनामों से सत्ता की वर्ग सापेक्षता की अवधारणा फिरसे जीवंत हो गई है। मोदी+शाह शासन काल में लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं का जितना क्षरण हुआ है, विगत में 2014 से पहले ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। बेशक़,1947 के बाद 1975 का घोषित आपातकाल भयावह स्वप्न ज़रूर था लेकिन, अघोषित आपातकाल में लोकतंत्र का संविधान निरंतर संकटग्रस्त प्रतीत होते हैं।

विश्व में निर्वाचन लोकतंत्र की तालिका में भारत का स्थान 179 देशों में से 110 वें पायदान पर है। इकनोमिक इंटेलिजेंस यूनिट की दृष्टि में भारत में ‘दोषपूर्ण लोकतंत्र’ है। यहां तक कि ‘उदार लोकतंत्र’ की तालिका में भी भारत का स्थान काफी नीचे है। बिहार के नवंबर चुनाव परिणामों ने लोकतंत्र की अवसानोमुखता पर मोहर-सी जड़ दी है।  

अतः क्या बिहार को  निर्वाचित तानाशाही की प्रयोगशाला का रूप दिया जा रहा? यह सवाल पाठकों को विचित्र लग सकता है। लेकिन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मोदी+शाह ब्रांड भाजपा की दूरगामी दृष्टि के दायरे में इस सवाल को रख कर देखें तो यह स्वाभाविक लगेगा, अचरजभरा नहीं।

इस सदी के आरम्भ में संघ परिवार ने गुजरात को हिन्दू राष्ट्र के प्रथम चरण की प्रयोगशाला बनाया था। गुजरात में 2002 के साम्प्रदायिक दंगों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को नई पहचान दी। विवादों के साथ उनकी और उनके लंगोटिया दोस्त अमित शाह की जोड़ी की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी। इस असाधारण उपलब्धि के पश्चात इस जोड़ी ने निरंतर आगे की तरफ़ ही देखा, एक सेकंड के लिए पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

जोड़ी की अर्जुन दृष्टि शत -प्रतिशत सफल भी रही, 2014 के आम चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी गांधीनगर से अभूतपूर्व चुनावी छलांग लगा कर दिल्ली पहुँच कर प्रधानमंत्री की गद्दी पर आसीन हो गए। 2014 की सफल उड़ान के बाद से ही इस जोड़ी का दिल्ली पर आधिपत्य है। यह भी असाधारण उपलब्धि है कि  दिल्ली-आधिपत्य के बाद से ही संघ, भाजपा और उससे सम्बद्ध प्रत्यक्ष व परोक्ष संस्थाओं का विस्तार हुआ है।

वे शक्तिसम्पन्न बने हैं। भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देखा जाता है। इस  मोदी+शाह जोड़ी के शासन काल में भी भाजपा ने कई राज्यों के सत्ता दुर्गों को जीता और उस पर अजेय का तमगा चस्पा। प्रदेशों की श्रृंखलाबद्ध विजय की कड़ी में  बिहार नवंबर की  प्रचण्ड विजय के साथ ताज़ा ताज़ा जुड़ा है; नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड तोड़ 10 वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

20 नवंबर को शपथ लेने से पहले नेपथ्य में नीतीश कुमार और मोदी+शाह जोड़ी के बीच दो-तीनरोज़ जमकर रस्साकसी चली क्योंकि भाजपा मुख्यमंत्री पद पर अपने नेता को बैठना चाहती थी। लेकिन, नीतीश  जोड़ी के हर पैंतरे को निष्प्रभावी बना कर मुख्यमंत्री की गद्दी पर जा बैठे। दोनों पक्षों ने अपनी इस पारी को अविश्वास और आशंकाओं की फ़िज़ा में शुरू किया है। राजनैतिक पर्यवेक्षकों की दृष्टि में नीतीश कुमार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे।

उनकी दुर्दशा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे जैसी बनाई जा सकती है। महाराष्ट्र में चुनावों से पहले शिंदे मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन, चुनाव परिणामों के बाद भाजपा ने उन्हें धत्ता बता कर अपने व्यक्ति देवेंद्र फडणवीस की मुख्यमंत्री पद पर ताज़पोशी कर दी थी। कालांतर में नीतीश कुमार की भी  यही नियति  हो सकती है। मूल मुद्दा यह है कि  क्या बिहार फ़तह के बाद भाजपा शेष भारत- विजय की तैयारी में जुट जाएगी? क्या देश को ‘तीसरी आज़ादी’ की ज़रुरत होगी, सवाल यह भी है?

1947 में मिली थी पहली आज़ादी; 1977 में जयप्रकाश नारायण  व जनता पार्टी ने ‘दूसरी आज़ादी ‘ का नारा गुंजित किया था; और भाजपा के सम्भावी एकछत्र राज के विरुद्ध ‘तीसरी आज़ादी’ के नारे को बुलंद करना होगा? ऐसे सवालों को यूं ही खारिज़ करके ख़तरों को आमंत्रित करने के समान है। राष्ट्रपति और राज्यपालों के अधिकारों को लेकर सर्वोच्च न्यायलय के ताज़ा फ़ैसले से देश में निर्वाचित तानाशाही की आशंका को ही बल मिला है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 20 नवम्बर के फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि वह राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए कोई समय तय नहीं कर सकता है। हो यह रहा है कि ग़ैर- भाजपा राज्यों में विधानसभा द्वारा पारित बिलों को राज्यपाल अनिश्चित काल तक दबाये रखते हैं। वे बिल पर अपनी मंज़ूरी देते नहीं हैं। राष्ट्रपति के यहां भी यही स्थिति है। परिणामस्वरूप, गैर-भाजपा सरकारों के अनेक महत्वपूर्ण बिल लटके रहते हैं और जन कल्याणकारी काम रुके रहते हैं।

इस असाधारण विलम्ब के कारण प्रदेश सरकारें बदनाम होती रहती हैं। इस सन्दर्भ में, दिल्ली की पूर्व आप सरकार और उपराज्यपाल के बीच आये दिन हुए टकरावों को याद किया जा सकता है। कई मर्तबा सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावज़ूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ और अंततः टकरावों के बीच केजरीवाल सरकार को जाना पड़ा। चुनावों में हारी।

तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे  ग़ैर -भाजपा सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव जग ज़ाहिर हैं। सचाई यह है कि भाजपा  विपक्ष की सरकारें को फूटी आंख देखना चाहती नहीं है। इसलिए वह राज्यपालों के माध्यम से  प्रदेश सरकारों के कामकाज़ को बाधित करती रहती है। सर्वोच्च न्यायालय के ताज़ा फ़ैसले से वह और अधिक शक्ति सम्पन्न होगी और  विपक्ष की सरकारों को  अस्थिर करने का अनुकूल अवसर मिल गया है।

अब संघ परिवार द्रुत गति से  एकछत्र राज स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। इस फैसले से देश के संघीय ढांचे को गहरा आघात पहुँच सकता है, लोकतंत्र मरणासन्न हो सकता है! 

प्रस्तुत लेख में सत्ता पक्ष और विपक्ष के चुनाव परिणामों की विवेचना नहीं है क्योंकि यह सर्वविदित है कि बिहार के चुनाव परिणाम विवादास्पद बन चुके हैं। इसमें विभिन्न स्तरों पर विभिन्न प्रकार के घपले हुए हैं। किसी भी दृष्टि से चुनाव प्रक्रिया को साफ़-सुथरी, न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। संक्षेप में, चुनाव आयोग की कार्यशैली गहनता के साथ संगीन विवादों -आरोपों में धंस चुकी है;  वोट चोरी- वोट डकैती के कथित आरोपों से आयोग की छवि दाग़दार हो चुकी है।

एक समय था जब विश्व स्तर पर भारतीय चुनाव आयोग की साख हुआ करती थी। अब पिछले एक अर्से से इसकी छवि धूलधूसरित हो चुकी है। इस पत्रकार ने 1967 से चुनावों की रिपोर्टिंग शुरू की थी। 20 वीं सदी के अंतिम दशक तक चुनाव -कवरेज किया गया। इस लम्बी अवधि में किसी आम चुनाव या विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग को ‘वोट चोरी – वोट डकैती’ जैसे शर्मनाक व अलोकतांत्रिक तमगों से सुसज्जित किया हो, याद नहीं पड़ता।  

बिहार में ‘बूथ कैप्चरिंग’ होती रही है। लेकिन, मतदाता सूची में अभूतपूर्व घपलों की ख़बर सुनने को नहीं मिली। सत्तापक्ष को जिताने के लिए हर सम्भव हथकंडा अपनाया गया क्यों संघ-सत्ता प्रतिष्ठान के लिए बिहार-विजय अस्तित्व- प्रश्न  बन चुका था। बिहार की हार-जीत से ही पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु तथा अन्य राज्यों की विधानसभा चुनावों में जीत-हार से भाजपा की भावी रणनीति जुड़ी हुई है। इसलिए  मोदी+शाह जोड़ी ब्रांड बिहार-विजय भाजपा के लिए अपरिहार्य रूप से आवश्यक थी।  

वास्तव में, बिहार में शासक पक्ष की प्रचण्ड विजय को हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की अभूतपूर्व जीतों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। पिछले दिनों में लोकसभा में प्रतिपक्ष के कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने अपने ‘पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन’ के माध्यम से चुनावी धांधलियों को उजागर किया था। इसकी शुरुआत उन्होंने कर्णाटक के चुनावों से की थी। इसके बाद से ही चुनाव आयोग की तटस्थता व विश्वसनीयता संदिग्ध हो चली थी।  

बिहार चुनाव, सत्ता प्रतिष्ठान और आयोग की कारगुजारियों की पराकाष्ठा है। निश्चित ही, एसआईआर  या ‘ विशेष गहन पुनरीक्षण’  के गर्भ में क्या छिपा है, लाख टके का सवाल है क्योंकि इस  प्रक्रिया को कई राज्यों में शुरू किया जायेगा।  पश्चिम बंगाल में शुरू हो चुकी है। पश्चिम बंगाल सहित दक्षिण के सभी राज्य एसआईआर के खिलाफ हैं। चेन्नई में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन दक्षिण राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक भी कर चुके हैं।

यह मामला सर्वोच्च न्यायलय तक पहुँच चुका है। इस मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सड़कों पर उत्तर चुकी हैं। कोलकता में प्रदर्शन किया जा चुका है। कांग्रेस सहित विपक्ष के अधिकांश दल एसआईआर के विरुद्ध खड़े हैं।  आख़िर वज़ह क्या है? क्यों विपक्ष इसे गहरे संदेह और आशंका भरी नज़रों से देख रहा है? कोई तो बात होगी। वैसे, विगत में भी कांग्रेस के ज़माने में एसआईआर किया जा चुका है।

लेकिन, मोदी+शाह शासन काल में इस प्रक्रिया को सहजता के साथ स्वीकार नहीं किया जा रहा है। इस प्रक्रिया को एकदलीय शासन व्यवस्था की आशंका की दृष्टि से देखा जा रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में एक यह घटना भी कम हैरतअंगेज़ नहीं है। 19 नवंबर को  देश के 272 सेवा निवृत शख्सियतों ने अपने एक संयुक्त पत्र को जारी  कर राहुल गांधी की कड़ी  मलामत की। वज़ह यह है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने  भारत के निर्वाचन आयोग को गंभीर विवादों के कटघरे में खड़ा कर  दिया है।

उस पर वोट चोरी और वोट डकैती के संगीन आरोप लगा कर उसकी विश्वसनीयता को आघात पहुँचाया है। 272 महानुभावों में शामिल वे लोग हैं जिन्हें प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से  मोदी-सरकार का लाभार्थी माना  जा रहा है। एक हस्ताक्षरकर्त्ता केंद्रीय मंत्री की पत्नी भी है। इससे अंदाज़ लगाया जा सकता है कि किस प्रकार के हितों को ध्यान में रख कर इन महाननुभवों ने पत्र जारी किया होगा।

दिलचस्प जानना यह है कि हस्ताक्षरकर्त्ता उच्च वर्ग व जाति के हैं। मोदी+शाह ब्रांड राजनीति ने बड़ी कीमियागीरी के साथ राजसत्ता का वर्ग सापेक्ष चरित्र को तैयार किया है। 1925 में जन्मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की एक सदी पूरी हो चुकी है। संघ की आराम्भ से ही भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित करने की  प्रचण्ड महत्वाकांक्षा रही है। वह देश में संघीय शासन प्रणाली के स्थान पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली के लिए प्रयास रत है।

उसे पार्टी का एकछत्र राज चाहिए। इसके लिए वर्तमान संविधान में आमूलचूल परिवर्तन या नया संविधान चाहिए। संघीय ढांचे में एकछत्र आधिपत्य सम्भव नहीं है। अतः ज़रूरी है कि विपक्ष की सरकारों को अधिकाधिक कमज़ोर किया जाए। देश भर में एसआईआर के माध्यम से मनवांछित चुनाव परिणाम रच जाएं। इसकी ताज़ा मिसाल हैं बिहार के चुनाव परिणाम। इससे पहले हरियाणा, महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों में भी ऐसा हो चुका है।

अगले वर्ष बंगाल सहित कई प्रदेशों में चुनाव होने जा रहे हैं। यदि, इसी प्रकार एसआईआर प्रक्रिया जारी रहती है तो विपक्ष की निरंतर हार होती रहेगी। भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान प्रदेश-दर-प्रदेश चुनाव जीतता रहेगा। कोई ताज्जुब नहीं है कि 2029 तक संघ का स्वप्न साकार हो जाए, भाजपा ने अपने कुत्सित इरादों को छुपाया भी नहीं है। उसे ‘ कांग्रेस मुक्त’ भारत चाहिए।

संघ परिवार जानता है कि कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जिसका अखिल भारतीय चरित्र है और वह पूंजीवादी राजनीति के सभी दांव-पेंच जानती है। इसलिए, इसकी मौत ज़रुरी है। पर, राहुल गांधी की विभिन्न यात्राओं और कार्यक्रमों से यह पुनर्जीवित होने लगी है। अतः राहुल गांधी  को  मोदी+शाह ब्रांड राजनीति के चक्रव्यूह में फांसा जाना चाहिए। राहुल की घेराबंदी के साथ-साथ  गैर- भाजपा सरकारों की घेराबंदी शुरू हो चुकी है।  

मीडिया की आज़ादी पहले से ही दम घोटू ज़िंदगी जी रही है। अब विपक्षी सरकारों की बारी है। उनकी साँसें भी  देर-सबेर  घुटने लगेगी। ऐसी स्थिति में विकल्प क्या है? केंद्रीय निर्वाचन आयोग अपने चाल-चरित्र-चेहरे को बदलने वाला है नहीं। सत्तारूढ़ दल  भाजपा चुनाव आयोग की कवच पहले से ही बनी हुई है। बिहार -जीत के बाद वह चट्टान के समान कड़ी रहेगी; ममता बनर्जी और स्टालिन कुछ भी कहते रहें, उसे तनिक भी परवाह नहीं है।

तब एक ही विकल्प है जनता के पास सीधे जाना। उसे जागरूक करना और लंबे संघर्ष के लिए तैयार करना। 1975 में इंदिरा गांधी के अधिनायकवादी शासन के  ख़िलाफ़ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति के माध्यम से जनता को गोलबंद किया गया था। 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बेदख़ल किया गया। सम्पूर्ण क्रांति की आंधी में  इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी, दोनों ही राय  बरेली  और अमेठी से चुनाव हार गए थे।

उत्तर भारत से कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया था। अलबत्ता,  दक्षिण भारत ने कांग्रेस के वज़ूद को  सुरक्षित रखा था। जनता पार्टी की इस अभूतपूर्व विजय को ‘दूसरी आज़ादी‘ से परिभाषित किया गया था।  पिछले एक दशक के घटनाचक्र के परिदृश्य में ‘तीसरी आज़ादी‘ की अपरिहार्य आवश्यकता महसूस होने लगी है।

अदालतों में पेटिशन के माध्यम से चुनाव सुधार के लिए गुहार लगाने से कुछ बदलेगा, ऐसा प्रतीत होता नहीं है क्योंकि मोदी+शाह ब्रांड सत्ता प्रतिष्ठान समझ चुका  है कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं, राजनैतिकता और संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में रह कर यह जोड़ी न ही सत्ता प्राप्त कर सकती है, और न ही लम्बे समय तक इसमें टिकी रह सकती है। संघ के विरागत स्वप्न को साकार करने के लिए उसके पास लोकतंत्र व संविधान पर निरंतर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का एकमात्र विकल्प शेष है।

इसलिए भारतीय  राष्ट्र राज्य की अधिकांश संवैधानिक संस्थाओं पर मोदी+शाह सत्ता के प्रतिबद्ध व समर्पित  कैडर तैनात हैं; न्यायपालिका नमनीय  बन चुकी है; सांसदों को थोक के भाव निलंबित कर संसद से  विधेयक पारित करा लिए जाते हैं।  गोदी मीडिया कुप्रचार के लिए अहर्निश तैयार रहता है, और विपक्ष लगभग ‘ब्लैक आउट’ रहता है।

याद रखें, संघ परिवार ने राजसत्ता + बहुसंख्यकवाद + नौकरशाही + सैन्यवाद + चरम राष्ट्रवाद + काल्पनिक शत्रुवाद + कॉर्पोरेट या याराना पूंजी के  विलक्षण  गठबंधन  से  बहुलतावाद, बौद्धिकता, लोकतंत्र, संविधान और शिक्षण संस्थाओं की घेराबंदी कर रखी है। इस घेराबंदी को तोड़ना असम्भव नहीं है, लेकिन आसान भी नहीं है। क्या इंडिया महागठबंधन के  घटक तैयार हैं इस घेराबंदी से मुठभेड़ करने के लिए? क्या सम्पूर्ण  कांग्रेस संगठन समर में उतरेगा?

दिल्ली समेत कई राज्यों में कांग्रेस का संगठन लचर हालत में है। कोई भी बड़ा बीड़ा उठाने से पहले  राहुल को  चाहिए कि वे अपनी पार्टी के ढांचे को चुस्त-दुरस्त करें। इसके साथ ही  वामदलों को छोड़, शेष घटकों में वैचारिक स्पष्टता  की कमी है? क्या जाति आधारित दल अपनी सीमाओं से ऊपर उठ सकेंगे? किसी भी प्रकार की आज़ादी के लिए काफी कुछ कुर्बान करना पड़ता है। आरम्भ से ही राहुल इसे विचारधारा की लड़ाई मानते आ रहे हैं।

यह ‘आईडिया ऑफ़ इंडिया’ को सुरक्षित रखने  की लड़ाई है, न कि सिर्फ दिल्ली पर कब्ज़ा ज़माने की।   इस दृष्टि से महागठबंधन को सोचने व तैयारी करने की ज़रुरत है। दिसंबर के मध्य में दिल्ली के रामलीला मैदान में एक विराट जनसभा की तैयारियां की जा रही है। निर्वाचन आयोग के विरुद्ध देश भर में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है।

राज्यों में एसआईआर को निर्ममतापूर्वक लागू किया जा रहा है; बूथ लेवल के ऑफिसरों पर भयानक दबाव बनाया गया है; परिणामस्वरूप, 22 नवंबर तक 19 दिनों में 6 राज्यों में 16 बीएलओ की मौतें हो चुकी हैं ( भास्कर, 23  नवंबर; दिल्ली संस्करण)  कुछ ने ख़ुदकुशी की है। माननीय मोदी और अमितशाह के राज्य गुजरात में भी फ़क़त 4 दिन में 4 की मौत हो चुकी है। बंगाल और राजस्थान में ख़ुदकुशी का सिलसिला चल रहा है।

दक्षिण के तमिलनाडु और केरल भी मौतों की चपटे में आ गए हैं। निर्वाचन आयोग दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक एसआईआर प्रक्रिया ख़त्म कर लेना चाहता था। इस हड़बड़ी में उसके लिए कर्मचारी सिर्फ ‘औज़ार‘ हैं, इंसान नहीं हैं। लगता है, संघ प्रतिष्ठान का कोई दूरगामी ‘ हिडन एजेंडा‘ है। हो सकता है, रणनीति के केंद्र में मध्यावधि चुनाव हों क्योंकि इस समय भाजपा सरकार दो बैसाखियों  पर चल रही है।

बिहार की तर्ज़ पर वह मध्यावधि चुनावों के माध्यम से लोकसभा में प्रचण्ड बहुमत हासिल करने का एजेंडा हो! संघ+भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान समझ चुका है कि वह लोकतान्त्रिक मर्यादाओं, राजनैतिक नैतिकता और संवैधानिक आचार संहिता का ईमानदारीपूर्वक पालन करते हुए वह कभी भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक एकछत्र राज स्थापित नहीं कर सकेगा।

2024 के आम चुनावों में  हिंदुत्व का हथकंडा भी पिट चुका है।अतः एसआईआर में धाँधलियों के माध्यम से नैया पार लग सकती है और 400 से पार सीटें पार हो सकती है। इसके साथ ही निर्वाचित तानाशाही का सिलसिला शुरू हो जाता है। 

इस परिदृश्य की पृष्ठभूमि में, निरंकुशता से निजात पाने के लिए ‘तीसरी आज़ादी‘ का आह्वान एक मात्र विकल्प शेष रहता है। जनता में इसका अलख जगाने की ज़रूरत है। सिविल सोसाइटी को सक्रिय होना होगा। साहित्यिक व संस्कृतिकर्मी आगे आएं। नुक्क्ड़ नाटक करें. महात्मा गांधी के परिवर्तन के शस्त्रों पर नई आवश्यकताओं के अनुरूप ‘सान’ चढ़ाएं। मेरी दृष्टि में प्रतिरोधी महात्मा आज़ भी प्रासंगिक हैं।  

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